पाँचवां वेद ? कितने हैं वेद ?

पाँचवां वेद ? कितने हैं वेद ?

  • अक्सर आपने विद्वानों को TV पर यह कहते हुए देखा / सुना होगा कि यह पवित्र ग्रन्थ है इसे पाँचवां वेद भी कहा गया है तो क्या वेद पाँच हैं ? केवल इतना ही नहीं अपितु कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि वेद तो केवल एक ही है कुछ विद्वान कहते हैं नहीं वेद  दो हैं लेकिन कुछ विद्वान कहते हैं नहीं नहीं वेद तो तीन हैं

  • परन्तु सामान्यतः तो हम सब ने यही पढ़ा / सुना है कि वेद चार हैं तो फिर सच्चाई क्या है आइये इन सभी दावों का विश्लेषण करते हैं और जानते हैं सत्य क्या है

सबसे पहले बात करते हैं उनकी जो मानते हैं कि

. वेद तो केवल एक है

  • जी हाँ यह सत्य है कि प्राचीन काल में वेदों को श्रुति कहा जाता था और श्रुति की एक वचन की ही संज्ञा है
  • वेद को श्रुति कहने का भी ठोस कारण है
  • सृष्टि के आदिकाल में परमेश्वर ने चार ऋषियों के हृदय में एकएक वेद का प्रकाशन किया
  • उन चारों से ब्रह्मा नाम के महापुरूष ने वेदों को सुना इससे दो बातें हुई. ब्रह्मा सृष्टि के पहले व्यक्ति बन गए जिन्हें चारों वेदों का ज्ञान मिला . क्योंकि ब्रह्मा ने वेदों को सुना था अतः वेदों का नाम श्रुति पड़ गया इतिहास में एक लम्बे समय तक वेदों को आचार्य के द्वारा बोलकर पढ़ाया जाता और शिष्यों द्वारा सुनकर याद किया जाता रहा
  • अतः चारों वेदों का संयुक्त नाम श्रुति होने से वेद केवल एक ही है

. नहीं वेद तो दो हैंबहुतसे विद्वान वेदों की संख्या दो ही मानते हैं

  • वे संहिता को एक और ब्राह्मण ग्रन्थों को दूसरा वेद मानते हैं
  • हुआ यूँ कि समय के साथसाथ वेदों को लिखने की प्रथा चल पड़ी और चारों वेदों के मन्त्र संग्रह को संहिता कहा गया
  • परन्तु समय के साथ मनुष्य की व्यस्तता भी किन्ही कारणों से बढ़ती चली गई और वेदमन्त्रों के अर्थ को समझना भी कठिन होता गया
  • तो महसूस किया गया कि ऐसे ग्रन्थों की रचना की जाए जो वेदमन्त्रों के अर्थ और सामान्य जीवन में उनकी उपयोगिता बताएँ
  • अतः ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की गई  और प्रत्येक वेद का कम से कम एक ब्राह्मण ग्रन्थ बनाया गया
  • जैसे 
  • .ऋग्वेद का ऐतरेय ब्राह्मण ,
  • .यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण ,
  • .सामवेद का सामब्राह्मण और
  • .अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण

         अतः यह कहा गया किमन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्  अर्थात् संहितायें और ब्राह्मण ग्रन्थ इस प्रकार वेद दो ही हैं

. नहीं नहीं वेद तो तीन हैं

  • आपको जानकर  शायद आश्चर्य हो कि एक बहुत बड़े कालखण्ड तक वेदों की संख्या , उस समय के सभी विद्वान् , तीन ही मानते थे
  • इसका कारण यह था कि चारों वेदों मे तीन प्रकार की विद्या है. ज्ञान . कर्म और . उपासना
  • ध्यान रहे कि भारतीय परम्परा में विज्ञान भी ज्ञान ही के अन्तर्गत आता है
  • अतः वेदों को त्रिविद्या कहा गया
  • तीन वेद होने का यही तात्पर्य है

 

. वस्तुतः वेद तो चार ही हैं

  • जी हाँ सच्चाई तो यही है कि वेद चार थे , चार हैं और चार ही रहेंगे
  • जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं सृष्टि के आदिकाल में परमेश्वर ने चार ऋषियों के हृदय में एकएक वेद का प्रकाशन किया
  • उन चारों से ब्रह्मा नाम के महापुरूष ने वेदों को सुना और गुरूशिष्य परम्परा से वेदों का पढ़ाना और पढ़ना अक्षुण चलता रहा
  • चारों वेदों के नाम इस प्रकार हैं.ऋग्वेद , .यजुर्वेद  .सामवेद और  .अथर्ववेद
  • . तो यह पाँचवां वेद क्या है ?

  • वास्तव में हिन्दू धर्म में वेदों का महत्व सर्वाधिक है वेद हमारे धर्म के आधार हैं
  • इस विषय पर हमारा वीडियोवेद ही धर्म के आधार हैंआप देख सकते जिसमें हमने प्रमाण सहित सिद्ध किया है
  • तो हम कह रहे थे कि वेद सर्वोपरि हैं और सभी विद्वान् इस विषय पर एकमत हैं
  • हम यह भी जानते हैं कि हिन्दु धर्म में अनेकों पवित्र ग्रन्थ हैं अतः किसी भी पवित्र ग्रन्थ के महत्व को समझाने के लिए यह कह दिया जाता है कियह पवित्र ग्रन्थ है इसे पाँचवां वेद भी कहा गया हैऔर ऐसा कहने में कोई दोष भी नहीं है
  • परन्तु यह अच्छी तरह समझ लें कि वेद तो केवल चार ही हैं और रहेंगे
  • आप को यह जानकर बेहद प्रसन्नता होगी कि हमारे पूर्वज ऋषिमुनियों ने वेदों की पवित्रता और शुद्धता बनाए रखने के लिए अनेकों कड़े नियम निर्धारित किए परिणाम स्वरूप युग बीत गए परन्तु वेद अक्षुण हैंएक अक्षर भी नहीं बदला है हाँ इस बारे में हम किसी अन्य वीडियो में चर्चा करेंगे

Note :-

  • वीडियोवेद ही धर्म के आधार हैं का  Link हमने नीचे  दे दिया है उस विडियो को अन्त तक अवश्य देखें
  • https://youtu.be/i1h_UIWHOh0
वेद ही धर्म के आधार हैं

वेद ही धर्म के आधार हैं

 

 

 वेद ही धर्म के आधार हैं

भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में वेदों का स्थान सर्वोच्च है

वेदों को अपौरूषेय कहा गया है अर्थात् वे किसी मनुष्य की

रचना नहीं हैं जिस प्रकार एक पिता अपनी सन्तान को अपने

ज्ञान,अनुभव धन रूपी समस्त सम्पत्ति सौंप देता है उसी प्रकार

परमेश्वर ने भी अपनी प्रिय सन्तान मनुष्य को वेद रूपी सम्पत्ति

प्रदान की हमारे पूर्वज समस्त ऋषिमुनियों ने वेद के महत्त्व को

बारबार समझाया है

स्मृति कहती है

वेदो ऽखिलो धर्म मूलम्  अर्थात् वेद ही धर्म के आधार हैं

वेद ही सर्वोपरि हैं

मीमांसा दर्शन कहता है

अपौरूषेयं वाक्यं वेद:  अर्थात् वेद अपौरूषेय हैं

वेदान्त दर्शन कहता है

निरपेक्षत्वाद् वेदस्य प्रमाणं प्रति

अर्थात् वेद स्वत: प्रमाण हैं

वेदह्यमृतम्

अर्थात् वेद अमृत स्वरूप हैं

देवीभागवत पुराण का कहना है

सर्वथा वेद एवासौ धर्ममार्गप्रमाणक:

सर्वथा वेद ही धर्म के मार्ग का प्रमाणकर्त्ता है

अत्रि संहिता में आया है

नास्ति वेदात्परं शास्त्रं

वेदों से ऊपर कोई नहीं है अर्थात् वेद सर्वोपरि हैं

वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं

अतुलित महिमा वेद की तुलसी किए विचार

जो निदंत निंदित भयो विदित बुद्धि अवतार ।।

मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं

जिनकी महत्ता का कोई पा सका है भेद ही

संसार में प्राचीन सबसे हैं हमारे वेद ही

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा है

वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है

वेद का पढ़नापढ़ाना और सुननासुनाना

सब आर्यों का परम धर्म है

वेद को मानने वाला ही नास्तिक है

सामान्यतः ईश्वर को मानने वाले को नास्तिक और

ईश्वर को  मानने वाले को आस्तिक कहते हैं परन्तु

भारतीय परम्परा के अनुसार वेद को मानने वाले

को नास्तिक कहते हैं और वेद की श्रेष्ठता को

मानने वाले को आस्तिक उदाहरण के लिए

सांख्यदर्शन ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं मानता

परन्तु वेद की श्रेष्ठता को मानता है

अतः आस्तिक दर्शन की श्रेणी में आता है

वेद की पुस्तकें ही मानव मस्तिष्क के प्राचीनतम् दस्तावेज हैं

पश्चिमी जगत् से ऋग्वेद का परिचय कराते हुए Ralph T.H. Griffith

ने F. Max Muller के शब्दों को इस प्रकार व्यक्त किया

“What can be more tedious than the Veda, and yet,

What can be more interesting, if once we know

that it is the first word spoken by the Aryan man ?”

“The Veda has a two-fold interest : it belongs to the

History of world and to the history of India……..

As long as man continues to take an interest in the

History of his race, and as long as we collect in libraries

And museums the relics of former ages, the first place

In that long row of books which contains the records of

The Aryan branch of mankind, will belong for ever to

The Rigveda.”

भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान् दार्शनिक विद्वान् डाॅ० राधाकृष्णन कहते हैं

The Vedas are the earliest documents of the human mind

that we possess.

विश्व के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में शुमार

जनवरी 2007 में विश्व के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में शुमार करते हुए

UNESCO ने यह घोषणा की

“The Vedas are generally known as the Scriptures of

Hindu Community. However, being among the first literary documents in the history of mankind, they transcend far beyond their identity as Scriptures. The Rigveda, the oldest among the four Vedas, is the fountain source of the so-called Aryan culture in all its manifestation that spread beyond the Indian Subcontinent to large parts of South and South East Asia, as well as parts of Central Asia.This valuable treasure of the ancient world has been preserved in the form of manuscripts in India, and handed down over centuries from generation to generation.”

परमेश्वर ने सृष्टि के आदिकाल में ही वेदों की रचना कर दी थी

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं

ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ।।

सच्चिदानन्द परमेश्वर ने सृष्टि के आदिकाल में ही वेदों, ऋषियों और यज्ञ की रचना कर दी थी

अतः समस्त साक्ष्यों से यही सिद्ध होता है कि

वेद ही धर्म के आधार हैं

By -आचार्य मुसद्दीलाल विष्णु

सद् बुद्धि कौन देता है ?

सद् बुद्धि कौन देता है ?

मनुष्य ग़लतियों का पुतला है

पुरानी कहावत है – “मनुष्य ग़लतियों का पुतला है

जानेअनजाने सभी से कभी कभी ग़लती हो ही

जाती है परन्तु ग़लती को दोहराना बुद्धिमानी नहीं है

एक ही पत्थर से दो बार ठोकर खाना लज्जाजनक है

ग़लती पर जानबूझकर जमे रहना आसुरिय है

अपनी ग़लती स्वीकार करना झाड़ु लगाने के समान है

जो गन्दगी को हटाकर सतह को साफ़ कर देता है

अतः ग़लती को स्वीकार करके सुधार लेना ही समझदारी है

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