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                 16th  June 2016  (Thursday)
      On 17th, Parana Time = 06:02 to 08:39


Ekadashi Tithi Begins = 07:26 on 15/Jun/2016
Ekadashi Tithi Ends = 09:54 on 16/Jun/2016


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Nirjala Ekadashi is a Hindu holy day falling on the 11th lunar day (Ekadashi) of the waxing fortnight of the Hindu month of Jyestha . The ekadashi derives its name from the water-less (Nir-jala) fast observed on this day. It is considered as the most austere and hence, most sacred of ekadashis. If observed religiously, it is said the most rewarding and granting the virtue gained by the observance of all 24 ekadshis in the year.



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Nirjala Ekadashi 2016: The Mythological Story Of

 Mahabharata



Origin of Nirjala Ekadashi Vrat is found in the mythological legend of Mahabharata. As per the story mentioned therein, out of the five Pandavas, Yudhisthira, Arjuna, Nakula and Sahadeva used to observe Ekadashi Vrat along with Kunti (their mother) and Draupadi (their wife). But Bhima, their second brother, was not able to do so, as he was fond of eating and controlling hunger was impossible for him. Once, he expressed his wish to observe the fast, but wanted to eat as well. However, as eating was against the ritual of Ekadashi fast; therefore, he went to his grandfather (Ved Vyasa) to seek help. On this, Vyasa suggested him to observe Nirjala Ekadashi Vrat, as it is equivalent to observing all the 24 Ekadashi Vrats. He also told him that observing this fast will compensate him for not being able to observe all the other Ekadashi Vrats of the year. Bhima followed his grandfather’s advice and observed the fast with faith and dedication. As a result of observing Nirjala Ekadasi fast and not consuming anything, he became unconscious on the very next morning. To get back to his senses, he offered Ganga Jal to Tulsi plant and ended his fast. After this, Nirjala Ekadashi came to be known as Bhima Ekadashi, Bhimseni Ekadashi, and Pandava Ekadashi.

Nirjala Ekadashi 2016: How to Observe Nirjala Ekadashi Vrat


The literal meaning of Nirjala is “without water”. This reason makes Nirjala Ekadashi Vrat the most difficult as well as the most sacred. Devotees find this fast more difficult and strict than others, as it falls in the summer season when surviving without water is not an easy task. Being a 24-hour long fast, Nirjala Ekadashi Vrat starts from sunrise of the day and ends on the sunrise of the next day i.e. Dwadashi (the twelfth day). This holy day is spent in the dedication of Lord Vishnu and chanting Mantras. However, if someone is unable to observe the Nirjala Ekadasi Vrat due to any reason, they can make donations to the needy people for seeking blessings of this meritorious day.
Nirjala Ekadashi 2016: Rituals Of Nirjala Ekadashi

  1. First of all purify yourself and take Sankalp for Nirjala Ekadashi Fast before sunrise.
  2. Bathe Vishnu’s idol with Panchamrit {mixture of milk, Ghee (purified butter), sugar, curd, and honey}.
  3. Worship deity of the day, Lord Vishnu, by lighting Diyas (earthen lamps), offering Tulsi leaves and fruits.
  4. Visit Vishnu’s temple and participate in the rituals of Nirjala Ekadashi Puja.
  5. Observe Nirjala Ekadasi Vrat.
  6. Donate clothes, food, gold, and other useful things to the needy people.
  7. Break Nirjala Ekadasi fast next morning, after worshiping the lord.                                                                                                                 

Nirjala Ekadashi 2016: Importance of Nirjala Ekadashi

 

Among all the Ekadashi Vrats, Nirjala Ekadashi Vrat is the most difficult one. For this reason, certain benefits are associated with the observance of Nirjala Ekadashi Vrat. Observing this extremely difficult Ekadasi Vrat is considered equal to:
  • Going on a pilgrimage
  • Burning all the sins and mistakes
  • Gaining the virtues of all the 24 Ekadashis of the year
  • Cleaning all the impurities and negativity from the body and soul


On this Nirjala Ekadashi in 2016, worship Lord Vishnu and observe Nirjala Ekadasi fast to achieve longevity, happiness, salvation, wealth, and prosperity.

Though Nirjala Ekadashi is not easy to observe, still performing it with the right rituals can open doors of success for you. Observe Nirjala Ekadasi in 2016 and get the blessings of Lord Vishnu along with the washing off all your evils. If you are not able to observe the other Ekadasi Vrats of this year, then Nirjala Ekadashi Vrat in 2016 can help you in compensating for each one of them.


Must Chant / Recite / Read in Ekadashi

Click here:- 

Sri Vishnu Sahashtranama / Sri Vishnu ke 1000 Naam

                              Narayana Gayatri Mantra

Om Narayanaya Vidhmahe Vasudevaya Dheemahe Thanno Vishnu Prachodayath.


Om, Let me meditate on Lord Narayana,
Oh, Lord Vasudeva, give me higher intellect,
And let Lord Vishnu illuminate my mind.

       Daan Samagri for Nirjala Ekadashi (Offer it to Brahaman )
1.Pitcher (Ghat) with water
   2. Fruits specially Watermelon  
3. Hand Fan
4. Offer any Drink (Thandhai)



निर्जला एकादशी व्रत कथा
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी



भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।

अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।




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