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भारतीय संस्कृति में प्रातः जागरण को एक आदर्श जीवनशैली व जीवनचर्या का आधार ही नहीं माना जाता, वरन् इसे एक धार्मिक कृत्य भी माना जाता है। वर्तमान में भी ब्रह्म मुहूर्त में जागने वाले मनुष्य को आदर्श दृष्टि से देखा जाता है।

क्या है ब्रह्ममुहूर्त~

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने, इस मुहूर्त का विशेष महत्व वर्णित किया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग हेतु सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में जागने से सौंदर्य, बल, बुद्धि, विद्या,सुख-संपत्ति व स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से ४ घड़ी (लगभग डेढ़ घंटे) पूर्व, ब्रह्म।मुहूर्त में जाग जाना चाहिए। इस समय सोना निषिद्ध होता है...

"ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी"
अर्थात,  ब्रह्म मुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।

करावलोकन – आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुये निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें –

कराग्रे वसति लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्म प्रभाते करदर्शनम्॥

हाथ के अग्रभाग (आगे) में लक्ष्मी, हाथ के मध्यभाग में सरस्वती और हाथ के मूलभाग में ब्रह्माजी निवास करते हैं, अतः प्रातःकाल दोनो हाथों का अवलोकन करना चाहिये।

सुबह जागने पर जमीन पर पैर रखते ही इस मंत्र का ध्यान रख कदम आगे बढ़ाएं - 

समुद्र वसने देवी पर्वतस्तन मण्डले।
विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे।।

वैज्ञानिक दृष्टि से प्राण ऊर्जा का प्रवाह~

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व वर्णित करने हेतु, हमारे वैज्ञानिक सोच निहित थी वैज्ञानिक शोध से ज्ञात हुआ है, कि ब्रह्म मुहूर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सर्वाधिक (४०%) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि हेतु महत्वपूर्ण होती है। इस समय फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक होता है। जो व्यक्ति इस समय जागकर, शुद्ध वायु का सेवन करते हैं, प्राणायाम करते हैं, उनके फेफड़े सशक्त व स्वस्थ रहते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में जागकर सर्वप्रथम धर्म एवं अर्थ का चिंतन कर, परम शक्ति परमेश्वर का स्मरण करना चाहिए। स्मरण करते हुए यह निश्चय करना चाहिए, कि पूर्ण दिवस परिश्रम व ईमानदारी से धनोपार्जन करेंगे। ब्रह्म मुहूर्त में प्राणवायु की अधिकता होने के कारण, इस समय पियूष व पिनियल ग्रंथियों से हार्मोंस स्राव होते हैं, जो मस्तिष्क की स्मरण शक्ति को विकसित करते हैं। अतः ब्रह्म मुहूर्त में जागने वाले व्यक्ति अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ, बुद्धिमान, सक्रिय व सजग होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में आलस्य कम होता है। इस समय किया गया प्राणायाम, योग, आसन एवं ध्यान जीवन में चमत्कारी परिणाम देते हैं।

आयुर्वेदिक महत्व~

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में जागकर, पदयात्रा करने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। इसी कारण इस समय प्रवाहित वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अतिरिक्त यह समय अध्ययन हेतु सर्वोत्तम होता है, क्योंकि रात्रि में विश्राम के उपरांत, प्रातः जागने पर शरीर तथा मस्तिष्क में भी ताजगी व स्फूर्ति होती है।

साधना का समय~

ब्रह्म मुहूर्त में वातावरण में शांति छाई रहती है। यदि हम सूक्ष्मता से निरीक्षण करें, तो आकाश में सूर्य की लालिमा छाने से पूर्व, पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देने लगती है। यदि ध्यान केंद्रित के इच्छुक हैं, तो चहुँ ओर व्याप्त शांति आपकी सहायता करती हैं। यह साधना हेतु भी उत्तम समय माना गया है। प्रातःकालीन वायु शरीर, मन व बुद्धि हेतु हितकारी होती है। प्रदूषणरहित हवा हमारे हृदय हेतु भी अत्योत्तम होती है।वातावरण एवं वायु भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग,तन, मन व बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

धार्मिक महत्व~

धार्मिक रूप से यह समय प्रातः सूर्योदय से पूर्व ४ से ५ बजे के मध्य माननीय है, किन्तु शास्त्रों में स्पष्टतः वर्णित है, की रात्रि के अंतिम प्रहार का तृतीय भाग अथवा ४ घड़ी तड़के ही ब्रह्म मुहूर्त होता है। मान्यता है, कि इस समय जाग कर अपने इष्ट अथवा ईश्वर का स्मरण, पूजन एवं पवित्र कर्म करना अत्यंत शुभ होता है, क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग व सुन्दर शरीर पर ईश्वर सुख एवं ऊर्जाकेरूप में कृपा बरसाते हैं। यह समयावधि धार्मिक कृत्यों पूजा, पाठ, योग, ध्यान आदि के संपादन हेतु सर्वाधिक अनुकूल होती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है। भगवान के स्मरण के उपरांत दही, घृत, आइना, श्वेत सरसों, बैल व फूलमाला के दर्शन भी इस काल में अत्यंत पुण्यदाई हैं।

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